उत्तरकाशी तबाही का सच: इसरो के सैटेलाइट चित्रों ने दिखाई भीषण बाढ़ की असली तस्वीर
परिचय: प्रकृति का कहर और विज्ञान की नज़र
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में हाल ही में आई भीषण फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़) ने जो तबाही मचाई, उसकी पूरी भयावहता जमीन पर मौजूद लोगों के लिए भी समझना मुश्किल थी। लेकिन अंतरिक्ष से आई इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) की नज़रों ने इस आपदा के असली पैमाने को बेरहमी से उजागर कर दिया है। सैटेलाइट इमेजेज ने न सिर्फ़ बर्बाद हुए इलाकों का विस्तृत नक्शा पेश किया है, बल्कि राहत और बहाली के कामों के लिए भी अहम आधार तैयार किया है।
उत्तरकाशी आपदा: क्या हुआ था?
तिथि: हाल के हफ़्तों में (विशिष्ट तिथि घटना के समय पर निर्भर करेगी)।
स्थान: उत्तराखंड का उत्तरकाशी ज़िला, विशेषकर भागीरथी नदी और उसकी सहायक नदियों के आसपास का इलाका।
कारण: अत्यधिक बारिश, बादल फटने की घटनाएँ, या ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी वजहों से नदियों में अचानक और भीषण बाढ़ आना।
तात्कालिक असर: सड़कों, पुलों, इमारतों और खेतों का भारी नुकसान। गाँवों का संपर्क टूटना। जान-माल की क्षति।
इसरो की निगाहें: आपदा को समझने का अंतरिक्षीय हथियार
जब ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं, तो इसरो अपने विशेष उपग्रहों और तकनीकों की मदद से तुरंत कार्रवाई करता है:
आपदा प्रबंधन का प्रोटोकॉल: इसरो राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राज्य सरकारों के साथ समन्वय में काम करता है।
रियल-टाइम निगरानी: RESOURCESAT, CARTOSAT और RISAT श्रृंखला जैसे भारतीय उपग्रहों को तुरंत घटनास्थल का डेटा एकत्र करने के लिए निर्देशित किया जाता है।
"बिफोर-आफ्टर" तुलना: सबसे प्रभावी तरीका है पुराने (आपदा से पहले) और नए (आपदा के बाद) सैटेलाइट चित्रों की तुलना करना। इससे क्षति का सटीक आकलन होता है।
डेटा का विश्लेषण: इसरो की एजेंसियाँ जैसे नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) इन छवियों को प्रोसेस करती हैं और क्षति मानचित्र (Damage Assessment Maps) तैयार करती हैं।
उपग्रह चित्रों ने क्या उजागर किया? (उत्तरकाशी के संदर्भ में)
इसरो द्वारा जारी उत्तरकाशी की सैटेलाइट इमेजेज ने भीषण तबाही की कई चौंकाने वाली परतें खोलीं:
नदी के मार्ग में भारी बदलाव: भागीरथी नदी या उसकी सहायक नदियों के प्रवाह पथ में आए बड़े बदलाव साफ़ दिखाई दिए। नदी ने अपना रास्ता बदला और नए इलाकों को अपनी चपेट में लिया।
व्यापक भूस्खलन: पहाड़ी ढलानों पर बड़े पैमाने पर भूस्खलन (Landslides) के निशान दिखे, जिन्होंने बस्तियों और बुनियादी ढाँचे को बुरी तरह प्रभावित किया।
बुनियादी ढाँचे की ध्वस्ती:
सड़कों के लंबे हिस्से पूरी तरह बह गए या मलबे में दब गए।
पुलों के टूटे हुए अवशेष नदी में बिखरे दिखे।
कई इमारतें (आवासीय और व्यावसायिक) या तो पूरी तरह गायब थीं या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त थीं।
खेतों और कृषि योग्य भूमि का बड़े पैमाने पर नुकसान।
मलबे के विशाल निशान: नदी के किनारों और जिन इलाकों से पानी उतरा था, वहाँ मलबे (पत्थर, मिट्टी, कंक्रीट के टुकड़े) की मोटी परत दिखाई दी।
आपदा प्रबंधन में सैटेलाइट इमेजेज का महत्व
इसरो के ये चित्र सिर्फ़ तस्वीरें नहीं, बल्कि जान बचाने और पुनर्निर्माण की राह दिखाने वाले महत्वपूर्ण उपकरण हैं:
राहत कार्यों की योजना: कौन से इलाके सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं? वहाँ पहुँचने के लिए कौन-सी सड़कें उपलब्ध हैं? सैटेलाइट मैप्स राहत दलों को सटीक जानकारी देते हैं।
संसाधनों का कुशल आवंटन: भोजन, पानी, दवाइयाँ, तंबू आदि को सबसे अधिक ज़रूरत वाले स्थानों पर पहुँचाने में मदद।
सुरक्षा जोखिम आकलन: भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों या अस्थिर इमारतों की पहचान करना, ताकि राहतकर्मी और निवासी सुरक्षित रहें।
दीर्घकालिक पुनर्निर्माण: क्षतिग्रस्त बुनियादी ढाँचे (सड़कें, पुल, बिजली लाइनें) की मरम्मत या पुनर्निर्माण की योजना बनाने का आधार।
भविष्य की तैयारी: ऐसे जोखिम भरे क्षेत्रों की पहचान करना जहाँ भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोहराई जा सकती हैं।
क्या आम जनता इन सैटेलाइट इमेजेज को देख सकती है?
जी हाँ! इसरो और इससे जुड़े संस्थान अक्सर प्रमुख आपदाओं के बाद सैटेलाइट डेराइव्ड इम्पैक्ट मैप्स जनता के लिए ऑनलाइन जारी करते हैं। आप यहाँ देख सकते हैं:
भूमि पोर्टल (Bhuvan Portal): इसरो का राष्ट्रीय जियो-पोर्टल (https://bhuvan.nrsc.gov.in)। आपदा के समय विशेष "डिजास्टर सपोर्ट" सेक्शन या "थीमैटिक सर्विसेज" में क्षति मानचित्र मिल सकते हैं।
नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) वेबसाइट: (https://www.nrsc.gov.in) भी आपदा संबंधी बुलेटिन और मानचित्र जारी करता है।
मोसडैक (MOSDAC): मौसम और समुद्री डेटा के साथ-साथ कभी-कभी आपदा संबंधी उत्पाद भी उपलब्ध होते हैं (https://www.mosdac.gov.in)।
निष्कर्ष: विज्ञान से उम्मीद की किरण
उत्तरकाशी की भीषण फ्लैश फ्लड ने एक बार फिर प्रकृति के सामने इंसान की असहायता दिखाई। लेकिन इसरो के सैटेलाइट चित्रों ने यह भी साबित किया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी आपदा की विभीषिका को समझने, उससे निपटने और भविष्य के लिए सीखने में हमारी सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं। ये चित्र सिर्फ़ तबाही के दस्तावेज़ नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पुनरुत्थान की नींव रखने वाला डेटा हैं। ज़रूरत है इनका सही इस्तेमाल करके प्रभावित लोगों के जीवन को फिर से पटरी पर लाने और पहाड़ों के नाज़ुक पर्यावरण को भविष्य के झटकों से बचाने की।

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